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समसामयिकी

उसे लगा की,काम खजाने आएँगे,  उसे भी कुछ लोग,बचाने आएँगे। प्यार और मार दोनों जानते हैं हम,  अब न तेरे गुजरे,जमाने आएँगे।

ये तरक्की नहीं

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ये तरक्की नहीं,जाने किस जहाँ को जा रहे हैं हम, फुटपाथ पर विद्या,एसी में जो जूते सजा रहे हैं हम। पहले जिसे वासी कह कर,फेंक दिया करते थे, बंद पैकेटों में बर्षों का जो खा रहे हैं हम।

मुक्तक

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समन्दर की लहरों में सैलाब ऐसा न था,  तेरे भी अधरों में ख्वाब ऐसा न था। सियासत के गलियारे में कदम पड़ गये शायद,  यूँ पहले चेहरे पर रुआब ऐसा न था।