मुक्तक

समन्दर की लहरों में सैलाब ऐसा न था, 
तेरे भी अधरों में ख्वाब ऐसा न था।
सियासत के गलियारे में कदम पड़ गये शायद, 
यूँ पहले चेहरे पर रुआब ऐसा न था।

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