मुक्तक

मुद्दतों बाद मिली तो रुलाई बहुत, 
अपनी गुस्ताखी की दी सफाई बहुत।
मेरी हर इल्तिजा को ठुकराने वाली, 
वक्त के तमाचे पर पछताई बहुत।
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