आज देश बचाने की जो बातें कर रहे हैं, हमारी कमाई अपनी तिजोरी में भर रहे हैं। खटमल की तरह खुद ही चूस रहे है देश को, फिर भी हमसे देशप्रेम की बातें कर रहे हैं।
ये तरक्की नहीं,जाने किस जहाँ को जा रहे हैं हम, फुटपाथ पर विद्या,एसी में जो जूते सजा रहे हैं हम। पहले जिसे वासी कह कर,फेंक दिया करते थे, बंद पैकेटों में बर्षों का जो खा रहे हैं हम।