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अमरेश गौतम "अयुज" अमरेश गौतम"अयुज" कवि/अभियंता रीवा,मध्यप्रदेश समाधान

मुक्तक

मुद्दतों बाद मिली तो रुलाई बहुत,  अपनी गुस्ताखी की दी सफाई बहुत। मेरी हर इल्तिजा को ठुकराने वाली,  वक्त के तमाचे पर पछताई बहुत। Title of the document प्ले बटन दबायें

समसामयिकी

आज देश बचाने की जो बातें कर रहे हैं,  हमारी कमाई अपनी तिजोरी में भर रहे हैं। खटमल की तरह खुद ही चूस रहे है देश को,  फिर भी हमसे देशप्रेम की बातें कर रहे हैं।

समसामयिकी

उसे लगा की,काम खजाने आएँगे,  उसे भी कुछ लोग,बचाने आएँगे। प्यार और मार दोनों जानते हैं हम,  अब न तेरे गुजरे,जमाने आएँगे।

ये तरक्की नहीं

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ये तरक्की नहीं,जाने किस जहाँ को जा रहे हैं हम, फुटपाथ पर विद्या,एसी में जो जूते सजा रहे हैं हम। पहले जिसे वासी कह कर,फेंक दिया करते थे, बंद पैकेटों में बर्षों का जो खा रहे हैं हम।

मुक्तक

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समन्दर की लहरों में सैलाब ऐसा न था,  तेरे भी अधरों में ख्वाब ऐसा न था। सियासत के गलियारे में कदम पड़ गये शायद,  यूँ पहले चेहरे पर रुआब ऐसा न था।