मुद्दतों बाद मिली तो रुलाई बहुत, अपनी गुस्ताखी की दी सफाई बहुत। मेरी हर इल्तिजा को ठुकराने वाली, वक्त के तमाचे पर पछताई बहुत। Title of the document प्ले बटन दबायें
आज देश बचाने की जो बातें कर रहे हैं, हमारी कमाई अपनी तिजोरी में भर रहे हैं। खटमल की तरह खुद ही चूस रहे है देश को, फिर भी हमसे देशप्रेम की बातें कर रहे हैं।
ये तरक्की नहीं,जाने किस जहाँ को जा रहे हैं हम, फुटपाथ पर विद्या,एसी में जो जूते सजा रहे हैं हम। पहले जिसे वासी कह कर,फेंक दिया करते थे, बंद पैकेटों में बर्षों का जो खा रहे हैं हम।